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नई दिल्ली4 मिनट पहले

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सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री को लेकर Sc में सुनवाई चल रही है। - Dainik Bhaskar

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री को लेकर SC में सुनवाई चल रही है।

केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि वाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिली जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस नागरत्ना ने यह टिप्पणी दाउदी बोहरा समुदाय की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल की दलील के जवाब में की थी। कौल ने कहा था कि ज्ञान और समझ, चाहे वह किसी भी सोर्स से मिली हो, उसे स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है। कौल एक अखबार में कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर के लिखे लेख का हवाला दे रहे थे, जिसमें धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम बरतने की बात कही गई है।

CJI सूर्यकांत ने कहा, हम सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों, विधिवेत्ताओं आदि का सम्मान करते हैं, लेकिन निजी राय निजी राय ही होती है।

इसके पहले कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को जरूरी (एसेन्शियल) या गैर-जरूरी घोषित करना कोर्ट के लिए मुश्किल है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान बेंच ने कहा कि संविधान में ‘एसेन्शियल’ शब्द का जिक्र नहीं है।

7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

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22 अप्रैल: सुनवाई के दौरान 5 मुख्य टिप्पणियां

  1. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि मंदिरों को अलग-अलग संप्रदाय के नाम पर बंद नहीं किया जा सकता। उन्होंने साफ कहा कि “हिंदू समाज को एक होना चाहिए” और अगर मंदिर दूसरों के लिए नहीं खुलेंगे तो खुद उस संप्रदाय को नुकसान होगा।
  2. सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि धार्मिक संप्रदाय एक “बंद और अनुशासित समूह” होता है, जिसे अपने नियम तय करने का अधिकार है। उन्होंने दलील दी कि पूजा कैसे, कब और किस तरह होगी। यह तय करने का हक श्रद्धालुओं और संप्रदाय के पास होना चाहिए।
  3. CJI सूर्यकांत ने कहा कि यह तय करना बेहद कठिन है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है और कौन-सी नहीं। उन्होंने माना कि हर प्रथा किसी न किसी रूप में धर्म से जुड़ी होती है, इसलिए कोर्ट के लिए इसकी सीमा तय करना आसान नहीं है।
  4. सीनियर वकील सीए सुंदरम ने कहा कि संविधान के तहत “क्लास” में जेंडर शामिल नहीं है। उन्होंने दलील दी कि पूजा स्थलों में महिलाओं की एंट्री का सवाल सीधे इस प्रावधान से नहीं जुड़ता, और इसे बराबरी के अधिकार के तहत अलग तरीके से देखना होगा।
  5. सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि धर्म की स्वतंत्रता पूरी तरह निरंकुश नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसी शर्तों के अधीन है। यानी धार्मिक अधिकार भी कुछ संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही लागू होते हैं।

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

पिछले 7 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…

7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत

8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा

9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा

15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता

17 अप्रैल- SC बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी

21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं

22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- हिंदू एकजुट रहें, संप्रदायों में बंटे नहीं

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री विवाद की टाइम लाइन

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सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही

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8 मिनट पहले

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कौन सी यूनिवर्सिटी अच्छी है या बुरी, यह बहस बेमानी

मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन सी यूनिवर्सिटी अच्छी है या बुरी, जो कि इस बहस के लिए असल में बेमानी है… बात बस इतनी है कि ज्ञान और जानकारी जहाँ से भी मिलें, उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए,” कौल ने कहा।

32 मिनट पहले

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हर धार्मिक प्रथा को जरूरी नहीं माना जा सकता

कोर्ट ने बुधवार को कहा कि हर धार्मिक प्रथा को जरूरी नहीं माना जा सकता। खासकर तब जब कोई प्रथा नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और अलग-अलग संप्रदायों के नाम पर विभाजन नहीं होना चाहिए।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा- हिंदू समाज को यह कहकर नहीं बांटा जा सकता कि हम एक अलग संप्रदाय हैं और वे दूसरे। ऐसा नहीं हो सकता कि वे हमारे मंदिर में न आएं और हम उनके मंदिर में न जाएं। अगर हिंदू संप्रदाय अपने दरवाजे दूसरों के लिए नहीं खोलेंगे, तो उन्हें ही नुकसान होगा।

यह टिप्पणी धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों, खासकर सबरीमाला मंदिर विवाद, और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा को लेकर सुनवाई के दौरान की गई।

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