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नई दिल्ली। भारत में विकसित स्वदेशी एचपीवी टेस्ट को लेकर आई नई रिसर्च ने सर्वाइकल कैंसर की सस्ती और व्यापक जांच का रास्ता खोल दिया है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर में प्रकाशित बहु-केंद्रित अध्ययन में चार भारतीय एचपीवी डीएनए टेस्टिंग प्लेटफॉर्म का मूल्यांकन किया गया, जिनमें से दो राष्ट्रीय स्क्रीनिंग कार्यक्रम के लिए उपयुक्त पाए गए हैं। ऐसे समय में यह अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब भारत 2030 तक सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है। देश में हर साल करीब 1.27 लाख नए सर्वाइकल कैंसर के मामले सामने आते हैं, जबकि लगभग 80 हजार महिलाओं की मौत हो जाती है। आंकड़ों के मुताबिक हर 7 मिनट में एक महिला इस बीमारी से जान गंवा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम लागत वाले स्वदेशी एचपीवी टेस्ट इस स्थिति को बदल सकते हैं। एचपीवी संक्रमण सबसे बड़ा कारण महंगे टेस्ट बने बाधा सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) का लगातार संक्रमण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) एचपीवी टेस्टिंग को बीमारी की रोकथाम का सबसे प्रभावी तरीका मानता है। हालांकि वर्तमान में उपलब्ध अधिकांश टेस्ट महंगे हैं और उन्हें अत्याधुनिक लैब की जरूरत होती है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों तक उनकी पहुंच सीमित रहती है। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट झज्जर की प्रोफेसर एमेरिटस डॉ नीरजा भाटला ने कहा, हमें ऐसे सस्ते, आसान और भरोसेमंद एचपीवी टेस्ट की जरूरत है, जिसका परिणाम तुरंत मिल सके। पीएचसी और आशा कार्यकर्ताओं तक पहुंचेगी तकनीक अध्ययन में पहली बार भारतीय एचपीवी टेस्टों का मूल्यांकन डब्ल्यूएचओ और आईएआरसी के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर किया गया। ये टेस्ट जिला और उप-जिला स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं में भी संचालित किए जा सकते हैं तथा इन्हें उपयोग करने के लिए न्यूनतम प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। इससे आशा कार्यकर्ताओं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग संभव हो सकेगी।




